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Devlok ki Devaki :  44 साल में नही समझ सका ‘मां’ शब्द का मर्म

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जब हम माँ के गर्भ से धरती पर प्रकट होते हैं। कुछ महीने बाद चलना और तुतली जुबान से बोलना सीखते हैं। तब ‘माँ’ ही पहला शब्द है, जिससे हमारा साक्षात्कार होता है। मेरी माँ देवकी देवी को मैं समझने का 44 साल तक अनवरत प्रयास किया। लेकिन एक अक्षर के वृहद शब्द ‘मां’ को मैं समझ ही नहीं सका। ईश्वर से तो हमारा कभी साक्षात्कार नहीं हुआ, मैंने धरती के भगवान माता-पिता को जरूर बहुत करीब से देखा है। परमपिता परमेश्वर साक्षी हैं कि मैंने पुत्र धर्म निभाने और जीवन के अंतिम समय में मां का सान्निध्य पाने के लिए, यथा संभव उनकी सेवा करने के लिए ‘पत्रकारिता धर्म’ को दरकिनार कर दिया। मैंने अपनी नौकरी को भी दांव पर लगा दिया, ताकि माँ की सेवा कर सकूं। उनकी भवनाओं को उनकी स्नेह मात्र के स्पर्श से समझ सकूं।

मां देव लोक की वह फरिश्ता थीं, जिन्होंने मुझे आत्म सम्मान के साथ जीना सिखाया। आज मन बड़ा ही व्याकुल है।  ” माँ की छत्रछाया में बिताए पलों को याद करके अंतर्मन रोता है।
वे लोग बहुत ही भाग्यशाली होते हैं, जिनके सिर पर माँ-बाप का हाथ होता है।” 
मां के जाने के बाद उनकी एक झलक पाने को अब मन तरसता है। उस देवी मां का साया सिर से उठ जाना अपूरणीय क्षति है। देवलोक की माता देवकी देवी के श्री चरणों में मेरा शत-शत नमन-वंदन है। 

मेरा मन कहता है, धन्य है वह मां जिनकी कोख ने मुझे इस दुनिया का साक्षात्कार कराया। देवकी देवी जैसी मां के गर्भ से अवतरण लेने के लिए तो भगवान भी तरसते हैं। हमारी पौराणिक मान्यताओं में भगवान विष्णु का श्रीकृष्ण अवतार इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। 
22 साल के पत्रकारिता जीवन में मैंने अनगिनत खबरें और लेख लिखा। आज जब मां के लिए पहली बार कुछ लिख रहा हूं, आँखों से अश्रुधारा रूकने का नाम नहीं ले रही है। मां की अच्छाइयों को समाज को समर्पित करने के ध्येय से कुछ लिखने का मन हुआ। मेरे इस आलेख से प्रेरित होकर कोई एक पुत्र भी अपने बूढ़े मां-बाप की सेवा का संकल्प कर लें, तो मेरा प्रयास सफल होगा।

108 कठिन दिन : जब माता ने अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं किया 

माता देवकी देवी त्याग की प्रतिमूर्ति थीं। उन्होंने इस जीवन के शरीर यात्रा के अंतिम चरण में पहले अन्न का त्याग किया। बाद में तरल खाद्य पदार्थों को लेने से इंकार कर दीं। अंतिम एक सप्ताह में तो उन्होंने ‘गंगाजल ‘ भी ग्रहण करने से निरंतर इंकार करती रहीं। हम दवाई और जबरिया जल ग्रहण कराते रहे।  83 वर्ष की आयु में भी उनमें तीन समय बड़े चाव से खाने का शौक और पचाने की क्षमता थी। फिर भी माता जी ने 108 दिन तक कठिन साधना और उपासना की। देह त्यागने से पहले पुण्यात्मा ने 108 दिन की कठिन उपवास रखी। देह त्याग करने से पूर्व उन्होंने कंचन काया को शुद्ध किया। 14 जुलाई से 29 अक्टूबर तक अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं किया। उनके स्वभाव से वाकिफ लोगों के लिए यह बहुत ही आश्चर्य का विषय था। क्योंकि वे सुबह-दोपहर-रात में (तीन समय) अलग-अलग सब्जी, वेज-नान वेज बड़े ही चाव से खाने की शौकीन थीं। माता जी का यकायक सबकुछ त्याग देना एक संयोग नहीं, बल्कि कठिन योग ही तो था। 

कठिन योग साधना से देह त्याग

त्याग की भावना ऐसी कि देहदान का प्रस्ताव भी उन्होंने मेरे समक्ष रखा। बिस्तर पर 100 दिन पूरा होते ही उन्होंने कहा कि बहुत सेवा हो गया बेटा ! अब मेरी काया किसी के काम आ जाए तो मुक्ति (मोक्ष) मिले। उन्होंने देह त्याग (देहावसान) के पहले ही देहदान कर लेने की ठानी। जिसे हमने मातृप्रेम में नजर अंदाज कर दिया। वे अंत तक कहती रहीं कि भरपूर जीवन जी ली हूं। अब चला-चली की बेला है तो पंचतत्व की काया किसी के काम आ जाए। इसे जलाकर भस्म करने से क्या लाभ? हम लोक परंपरा और अंतिम संस्कार के पुत्र धर्म की लालसा में देहदान की उनकी अंतिम इच्छा पूरी नहीं कर सके। इसलिए उनकी अंतिम इच्छा की पूर्ति मैं अपना देहदान करके करने जा रहा हूं। अपने परिजनों की सहमति से ऐसा करने का संकल्प ले रहा हूं। इसलिए अपने पुत्र तीर्थराज से माता जी का अंतिम संस्कार से लेकर पिंडदान सबकुछ कराया।

माता देवकी देवी की देखभाल करती कुसुम व मीना

इच्छा मृत्यु का वरण

देह त्याग के 24 घंटे पहले तक उनके चेतन मन में धर्म-कर्म की उधेड़बुन रही। 28 अक्टूबर की सुबह मैं एक जरूरी बैठक के सिलसिले में रायपुर जाने की तैयारी कर रहा था। तब उन्होंने अंतिम बार मुझसे बातचीत की। मैंने तत्काल ही अगले कुछ दिनों के लिए कहीं भी जाने-आने का कार्यक्रम स्थगित किया। और सोशल मीडिया में यही स्टेटस अपडेट किया। उन्होंने हमें विदाई की बेला का संकेत दे दी थी। इसी दिन शाम को पंडित अजय पांडेय जी अपने घर से एक हाथ में गीता और दूसरे हाथ में बैठने का आसन लेकर अचानक हमारे घर पहुंचे। उन्होंने तत्काल दीपक जलाने का हमें आदेश दिया। आध्यात्मिक उन्नति के लिए निरन्तर अध्ययन-पाठ करने वाले पुरोहित पांडेय जी को भी सम्भवतः माता जी की मंशा का पूर्वाभास हो गया था। उन्होंने सवा घंटे तक अनवरत गीता पाठ किया। दोनों हाथ जोड़े माता देवकी देवी बिस्तर पर ही गीता पाठ सुनती रहीं। उन्होंने गीता पाठ के बाद रात में आठ बजे अंतिम बार चरणामृत का प्रसाद ग्रहण किया। रात दो बजे, सुबह चार बजे उनसे पुनः गंगाजल ग्रहण करने का आग्रह किया गया। बेटियों लीला-लोमती और बहू मीना ने जिद्द कर गंगाजल पिलाने की कोशिश की। जिसे उन्होंने मुंह में हाथ रखकर जलग्रहण करने से इंकार कर दिया। यह उनके संस्कार का ही प्रबल प्रभाव था कि अंतिम समय में बहू मीना और पोती कुसुम चौबीसों घंटे अनवरत सेवा करती रहीं।

देह त्याग के समय में भी बहुत कुछ त्याग

कहा जाता है कि धरती पर जन्म लेने के समय ही हर जीव और इंसान के देहत्याग का समय भी सुनिश्चित हो जाता है। माता जी अक्सर कहती थीं कि उन्हें ज्योतिष ने बताया है कि जब मैं परलोकगमन कर जाऊंगी, किसी को कष्ट नहीं होगा। अर्थात शाम को अथवा रात में देह त्यागने पर परिजनों को दाह संस्कार के लिए इंतजार करना पड़ता। जीवात्मा के देह त्याग के बाद अंतिम संस्कार जल्दी हो जाए, यही सबकी कामना होती है।माता जी ने 29 अक्टूबर की सुबह 6.40 बजे अंतिम सांस ली। उनके देह त्याग के सवा पांच घंटे बाद ही अंतिम यात्रा निकल गई। और दोपहर तक अंतिम संस्कार भी हो गया। और उनका शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया। इस तरह उन्होंने अंत में भी किसी को कष्ट नहीं दिया।

देवकी देवी साहू

संक्षिप्त जीवन परिचय

माता देवकी देवी साहू का जन्म एक जनवरी 1938 को तत्कालीन रायपुर (वर्तमान में महासमुन्द) जिले के पिथौरा ब्लॉक के गांव घोघरा में हुआ था। दूरस्थ अंचल के इस गांव में तब शिक्षा व्यवस्था का अभाव था। इस वजह से वह शिक्षित नहीं हो पायीं। अशिक्षित होते हुए भी वह हमें मानवता का ऐसा पाठ पढ़ा गईं, जो शिक्षित और विद्वान लोग भी नहीं कर पाते हैं। कठोर परिश्रम और संस्कार से उन्होंने परिवार की सम्पूर्ण जिम्मेदारी निभाई। झिलमिला (पटेवा) निवासी परसराम साहू के साथ उनका विवाह हुआ। देवकी देवी, तीन बेटी और दो बेटों की जननी बनीं। बच्चों की शिक्षा-दीक्षा और भरण पोषण पर उन्होंने संपूर्ण ध्यान केंद्रित किया। इस बीच 4 अक्टूबर 1991 को ज्येष्ठ सुपुत्र रिखीराम का असामयिक देहावसान हो गया। इस दुःख से उबर नहीं पाई थीं कि 18 सितम्बर 1998 को पति परस राम का हृदयाघात से देहावसान हो गया। इससे उन्हें गहरा सदमा लगा और अवसादग्रस्त होकर हृदय रोग से ग्रसित हो गईं। बीस साल से अधिक समय तक  उनका हृदय रोग का उपचार चलता रहा। और नियमित रूप से दवाई के सेवन से जीवटता के साथ जीवन बसर करते हुए हमें संभालती रहीं। करीब पांच साल पहले शुगर लेवल बढ़ने के बावजूद वह हार नहीं मानी। नियमित दिनचर्या और परहेज के साथ खानपान से स्वास्थ्य का बराबर ध्यान रखतीं थी। वे गंभीर बीमारियों से जूझते हुए भी वृद्धावस्था में भी बहुत ही दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ जीवन बसर करती रही। फिर 14 जुलाई की वह मनहूस रात आई, जब उन्हें मृत्यु शैय्या पर 108 दिन की तपस्या के लिए सुला गई।

ऐसे पेश किया दानशीलता की मिसाल

तीन बहनों में सबसे बड़ी होने, कोई भाई नहीं होने का फर्ज निभाते हुए देवकी देवी ने अपनी संपूर्ण पैतृक संपत्ति को अपनी दो छोटी बहनों को दान कर दी। खुद अभाव में जीवन बसर करते हुए जीवन के बुरे दिनों में सब्जी बेचकर, खेती करके स्वावलंबन से जीवन बसर करती रहीं। मध्यमवर्गीय किसान परिवार में उनका विवाह हुआ था। अभावग्रस्त होते हुए भी उन्होंने अपने बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं की। कभी अपने परिवार का सिर झुकने नहीं दिया।

दानशीलता और त्याग की प्रतिमूर्ति

उन्होंने बुढ़ापे में अपनी जमा पूंजी एक लाख रुपये से अधिक छत्तीसगढ़ सरकार को दान कर दी।  “मुख्यमंत्री तीर्थयात्रा योजना” में विकास यात्रा के दौरान 24 मई 2013 को दान करके दानशीलता का अनूठा उदाहरण उन्होंने पेश किया। तब छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने सरायपाली (महासमुन्द) में प्रेसवार्ता के दौरान उनकी उदारता और दानशीलता को नमन करते हुए समाज के लिए अनुकरणीय उदाहरण बताया और आभार जताया था। साथ ही उन्हें दानशीलता और त्याग की प्रतिमूर्ति बताया।

सादा जीवन-उच्च विचार के साथ जीवन यात्रा

पिता की संपत्ति तो वह दान कर ही चुकी थी। उनके चाचा रामप्रसाद भी निःसंतान थे। उन्होंने घोघरा गांव की अपनी पैतृक संपत्ति  बेचकर अमुर्दा (बागबाहरा) में जमीन खरीदी थी। जब उनके चाचा रामप्रसाद इस दुनिया में नहीं रहे तो उनकी जमीन पर एक व्यक्ति काबिज हो गया। माता देवकी देवी ने उन्हें समझाया और काबिज व्यक्ति को आधा जमीन दान स्वरूप स्वीकार कर आधा छोड़ देने कहा। ग्रामीण नहीं माना। तब अपने हक के लिए माता जी ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। अंततः न्यायालय में सत्य की जीत हुई। कब्जाधारी बेदखल हुए। माता जी की महानता देखिए कि उन्होंने कोर्ट से केस जीतने के बाद भी कब्जाधारी को आधा जमीन दान में देने की अपनी बात पर अडिग रहीं। इसके लिए अमुर्दा गांव में चौपाल बुलाई गई। जहां वह व्यक्ति नहीं आया, जिसे अपने हिस्से की जमीन को माताजी दान करना चाहती थीं। वह अपना हक जताने कोर्ट का चक्कर लगाते रहा। माता जी को आजीवन इस बात का मलाल रहा कि बुढ़ापा में चाचा की देखभाल करने वाले उस सख्श को चाहकर भी वह दान नहीं कर सकीं। 

सफेद बाल बिखरे हुए, अंतिम तस्वीर

अंत समय में…

14 जुलाई 2020 की कभी नहीं भूल पाने वाली वह मनहूस काली रात। जब डेढ़ बजे माता जी को चक्कर आया और वह अपने कमरे में गिर गईं। कमरे में साथ में सो रही मेरी बिटिया कुसुम ने हमें नींद से जगाया। उपचार के लिए उन्हें चिकित्सालय में भर्ती कराया गया। गिरने से जांघ और कमर की हड्डी में फ्रैक्चर हो गया था। सर्जरी कराने की सलाह चिकित्सकों ने दी। जिसे माता जी ने नकार दिया। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति से उपचार जारी रहा। वह बेड रेस्ट पर चली गईं। इससे स्वास्थ्य में निरंतर गिरावट आने लगी।  उन्होंने देह त्याग की भावना से अन्न का त्याग कर दिया। करीब साढ़े तीन महीने तक हमारी जिद्द पूरी करने वह फलों के जूस के सहारे जीवन बसर करती रहीं। अंत समय में जूस और गंगा जल का भी त्याग कर इच्छा मृत्यु का वरण करते हुए अंततः वे देह त्याग कर परलोकगमन कर गईं।

फोटो- आनंदराम साहू

माता जी की प्रेरणा से हमारा तीन संकल्प

  1. राष्ट्रीय कार्यक्रम “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” को फलीभूत करते हुए हम आज उस मासूम बच्ची, मातृ स्वरूपा “काव्या यादव माता- स्व.भुनेश्वरी यादव, पिता-परमेश्वर (गोलू) यादव” को पढ़ाने-बढ़ाने का संकल्प ले रहे हैं। जिन्होंने जन्म लेने के तीसरे दिन ही 10 अक्टूबर 2020 को अपनी मां को खो दिया है। पहली से बारहवीं कक्षा तक की उसकी संपूर्ण शिक्षा का दायित्व हमारा परिवार उठाएगा। इस पर होने वाले संपूर्ण व्यय की व्यवस्था माता जी की कृषि भूमि से होगी।
  2. माता जी की अंतिम इच्छा का अनुशरण और पूर्ति करते हुए मैं आनंदराम साहू पिता स्व. परसराम दृढ़ निश्चय के साथ ‘देहदान’ और ‘नेत्रदान’ का संकल्प कर रहा हूं। मेरे देहावसान के बाद निकटस्थ मेडिकल कॉलेज अस्पताल में देहदान करके मेरे परिजन इस संकल्प को पूरा करेंगे। मेरे नेत्र को जरूरतमंद को दान करेंगे, जिससे कोई बदकिस्मत भी मेरी आंखों से दुनिया देख सकेंगे।
  3. माता देवकी देवी साहू की स्मृतियों को चिर स्थाई बनाये रखने के लिए परसकोल जनकल्याण समिति दीनदयाल नगर महासमुन्द को एक लाख रुपये स्वेच्छानुदान हमारे परिवार की ओर से दे रहे हैं। जिससे कि पिता स्व. परस राम साहू की स्मृति में शुरू हुआ सांस्कृतिक मंच निर्माण का अधूरा कार्य पूरा हो सके। और ‘कॉलोनी परिवार’ इस मंच का सुख-दुःख के कार्यक्रम में निःशुल्क उपयोग कर सकें।

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