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स्वामी विवेकानंद की जयंती आज, जानिए उनके जन्मदिन को क्यों कहते हैं युवा दिवस

आज स्‍वामी विवेकानंद जी की जयंती (Swami Vivekananda Jayanti) है. उनकी जयंती के दिन ही हर साल राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है.

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आज स्‍वामी विवेकानंद जी की जयंती (Swami Vivekananda Jayanti) है. उनकी जयंती के दिन ही हर साल राष्ट्रीय युवा दिवस (National Youth Day) मनाया जाता है. स्वामी विवेकानंद का जीवन और विचार दोनों ही प्रेरणा के स्त्रोत हैं. स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) के विचारों पर चलकर लाखों युवाओं के जीवन में बदलाव आया.

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बता दें कि भारत में हर साल 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जयंती (Swami Vivekananda Jayanti)के अवसर पर राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है. 12 जनवरी 1863 में जन्मे स्वामी जी का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था. उनके पिता विश्वनाथ दत्त हाईकोर्ट के वकील थे. मां भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों वाली थीं.   

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देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी स्वामी विवेकानंद के जन्‍मदिवस को युवा दिवस के रूप में काफी धूमधाम से मनाया जाता है. हर साल ये दिन 12 जनवरी को मनाए जाने का विधान है, क्योंकि साल 1863 में इसी दिन कोलकाता के एक साधारण परिवार में स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था. बाद में अध्यात्म के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए कार्यों को देख, देश-विदेश के युवाओं का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हुआ. बचपन से ही विवेकानंद जी को संगीत, साहित्य, तैराकी, घुड़सवारी और कुश्ती में रूचि थी.

25 साल की उम्र में  संन्यासी बन गए थे विवेकानंद (Swami Vivekananda Jayanti)

नरेंद्र नाथ 1871 में आठ साल की उम्र में स्कूल गए. 1879 में उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज की प्रवेश परीक्षा में पहला स्थान पाया.  वह 25 साल की उम्र में  संन्यासी बन गए थे. वहीं कॉन्वेंट में पढ़े स्वामी जी बचपन से ही काफी जिज्ञासु थे और उनकी इसी जिज्ञासा ने उन्हें ईश्‍वर को समझने और सनातन धर्म को जानने की दिशा में आगे बढ़ाया.

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विवेकानंद (Swami Vivekanand) ने अमेरिका के शिकागो में 1893 में विश्व धर्म महासभा में देश के सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस थे। उनकी याद में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। बता दें कि विवेकानंद का जन्म कोलकाता में हुआ था।

संन्यास के बाद उनका नाम रखा गया विवेकानंद (Swami Vivekananda Jayanti)

संन्यास के बाद इनका नाम विवेकानंद (Swami Vivekanand) रखा गया। गुरु रामकृष्ण परमहंस विवेकानंद की मुलाकात 1881 कोलकाता के दक्षिणेश्वर काली मंदिर में हुई थी। परमहंस ने उन्हें मंत्र दिया सारी मानवता में निहित ईश्वर की सचेतन आराधना ही सेवा है।  विवेकानंद जब रामकृष्ण परमहंस से मिले तो उन्होंने सबसे अहम सवाल किया ‘क्या आपने ईश्वर को देखा है?’ इस पर परमहंस ने जवाब दिया- ‘हां मैंने देखा है, मैं भगवान को उतना ही साफ देख रहा हूं, जितना कि तुम्हें देख सकता हूं, फर्क सिर्फ इतना है कि मैं उन्हें तुमसे ज्यादा गहराई से महसूस कर सकता हूं’।


 रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे विवेकानंद

शिकागो में दिया उनका भाषण आज भी सबके बीच प्रसिद्ध है, जहां उन्होंने भारत और सनातन धर्म का इतनी संवेदनशीलता व गहराई से प्रतिनिधित्व किया था कि हम सब आज भी गौरवांवित महसूस करते हैं. स्वामीजी ने ही दुनिया को बताया था कि असली भारत, यहां की संस्कृति और सभ्यता दरअसल क्या है. रामकृष्ण परमहंस के इस प्रिय शिष्य ने हमें धर्म को देखने का एक नया और वैज्ञानिक नजरिया दे दिया. यही वजह है कि उनका नाम आते ही हम एक अलग ही अनुभूति से गुजरते हैं. उनके जन्मदिवस को युवा दिवस के तौर पर मनाया जाता है.

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शिकागो धर्म संसद में जब स्वामी विवेकानंद ने ‘अमेरिका के भाइयों और बहनों’ कहकर भाषण शुरू किया तो दो मिनट तक सभागार में तालियां बजती रहीं। 11 सितंबर 1893 का यह दिन हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गया। विवेकानंद ने 1 मई 1897 में कोलकाता में रामकृष्ण मिशन और 9 दिसंबर 1898 को गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की।


विवेकानंद को थी दमा और शुगर की बीमारी

विवेकानंद को दमा और शुगर की बीमारी थी। यह पता चलने पर उन्होंने कह दिया था- ‘ये बीमारियां मुझे 40 साल भी पार नहीं करने देंगी।’ उनकी यह भविष्यवाणी सच साबित हुई और उन्होंने 39 बरस में 4 जुलाई 1902 को बेलूर स्थित रामकृष्ण मठ में ध्यानमग्न अवस्था में ही महासमाधि धारण कर ली। उनका अंतिम संस्कार बेलूर में गंगा तट पर किया गया। इसी तट के दूसरी ओर रामकृष्ण परमहंस का अंतिम संस्कार हुआ था।

विश्वनाथ दत्त की मृत्यु

बता दें कि 1884 में स्वामी विवेकानंद के पिता विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। पिता की मृत्यु के बाद अत्यंत गरीबी की मार ने उनके चित्त को कभी डिगने नहीं दिया। संगीत, साहित्य और दर्शन में विवेकानंद को विशेष रुचि थी। तैराकी, घुड़सवारी और कुश्ती उनका शौक था।

मानवता की दिव्यता के उपदेश का स्वाभाविक फल था निर्भयता और व्यावहारिक अंग्रेज जाति ने स्वामीजी के जीवन की कई घटनाओं में इस निर्भयता का प्रत्यक्ष उदाहरण देखा था। बता दें कि स्वामी विवेकानंद का मात्र 39 साल की उम्र में 4 जुलाई 1902 को निधन हो गया था।

पिता की मौत ने भी नहीं तोड़ा मनोबल

स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) ने अपनी तेजस्वी वाणी और अपने प्रभाव से विदेशों में भी भारतीय संस्कृति और अध्यात्म का डंका बजाया. उनके द्वारा सदैव वैज्ञानिक सोच तथा तर्क पर बल ही नहीं दिया गया, बल्कि उन्होंने धर्म को लोगों की सेवा और सामाजिक परिवर्तन से जोड़ने की अपनी विचारधारा को भी लोगों तक पहुंचाने का कार्य किया. जब स्वामी विवेकानंद 20 वर्ष के थे, तब ही उनके पिता विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई थी. ऐसे में पिता की मृत्यु के बाद स्वामी विवेकानंद को भी, अत्यंत गरीबी की मार का सामना करना पड़ा था लेकिन गरीबी और भूख भी उनका मनोबल और ईमान नहीं डगमगा सकी.

युवाओं का मार्गदर्शन

स्वामी विवेकानंद का संपूर्ण जीवन, उनके संघर्ष और उनकी विचारधारा, ये सभी सैकड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं क्योंकि स्वामी विवेकानंद के विचारों पर चलकर ही लाखों-करोड़ों युवाओं ने अपने जीवन में सही बदलाव कर उसे सार्थक बनाया. सन् 1893 में स्वामी विवेकानंद को अमेरिका के शिकागो में आयोजित किए गए विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला था. स्वामी विवेकानंद जी, रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे और उन्होंने ही रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी, जो आज भी भली-भांति जनहित के लिए कार्य कर रहा है.

स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर राज्यपाल ने दी शुभकामनाएं

वहीं छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसुइया उइके ने स्वामी विवेकानंद जी की जयंती ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। अपने संदेश में राज्यपाल ने कहा है कि स्वामी विवेकानन्द के विचारों ने संपूर्ण समाज को एक नई दिशा दी है। स्वामी विवेकानंद जी का यह संदेश ‘उठो, जागो, और ध्येय की प्राप्ति तक रूको मत’ सदैव देश और दुनिया के युवाओं को प्रेरित करता रहेगा। राज्यपाल उइके ने कहा कि स्वामी जी के विचार आज भी उतने ही महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हैं। आज उनके जन्म दिवस के अवसर पर हम सबको उनके बताए हुए रास्ते पर चलने का संकल्प लेना चाहिए।

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